तीर्थ स्थल
मक्का
मक्का जिसे अरबी में "मक्का अल मुकर्रमह" भी कहा जाता है विश्व भर के
मुसलमानों का एक अति पाक स्थान है जो सउदी अरब में स्थित है।
मक्का शहर
एतिहासिक हेज़ाज क्षेत्र में स्थित हैं तथा सउदी अरब के मक्काह प्रान्त की
राजधानी है यह शहर जेद्धा से 73 कि0मी0 की दूरी पर है। इस्लाम में पाक
मक्का शहर हज यात्रा के लिये जाना जाता है जहाँ पर पूरे विश्व से हर साल
लगभग 30 लाख लोग हज करने आते है हर मुस्लिम की यह ख्वाहिश होती है कि वह
जीवन में एक बार हज जरूर करके आये। मक्का को इसलिये भी बहुत पवित्र मानते
है क्योंकि इस्लाम धर्म के संस्थापक पैगम्बर हज़रत मोहम्मद साहब का यही
पर 571 ई0 में जन्म हुआ था। माना जाता है कि मक्का की स्थापना इस्माइल वंश
ने की थी। पैगम्बर हज़रत मोहम्मद साहब ने यहीं पर तत्कालीन सामाजिक एवं
धार्मिक कुरीतियों का विरोध किया था जिसके कारण यहाँ के शासक इनके खिलाफ
हो गये थे जिससे मोहम्मद साहब को मक्का छो़डकर मदीना जाना पड़ा। प्राचीन
समय में मक्का एक प्रमुख व्यापारिक एवं सामरिक केन्द्र था तथा यहाँ से
पूरे विश्व में इस्लाम का प्रचार एवं प्रसार हुआ था। 966 से 1924 तक
मक्का एक स्वतन्त्र राज्य था तथा यहाँ पर स्थानीय शासन था, 1924 में यह
नगर सउदी अरब राष्ट्र के अन्तर्गत आ गया था।
मक्का में हज यात्रा के समय गैर मुस्लिमों का प्रवेश पूरी तरह से वर्जित
है। यहाँ पर पाक "काबा" को पैगम्बर अब्राहम और उनके बेटे पैगम्बर इस्माइल
द्वारा बनवाया गया था इसे काले कपड़ों से ढका गया है तथा हज यात्री इसकी 7
बार परिक्रमा करते है।
"अर-हरम-मस्जिद" मक्का की एक अत्यन्त पाक मस्जिद है जिसे काबा के पास में
बनाया गया है, इसे दुनिया की सबसे पाक और विशाल मस्जिद का दर्जा हासिल
है इस मस्जिद में एक साथ कई लाख लोग नमाज अदा कर सकते है।
यहाँ पर
काबा से 4 मील दूर मदीना के रास्ते में "अल तनीम" (मस्जिद-ए-आइशा) एक विशाल
मस्जिद है यहाँ पर भी बड़ी संख्या में लोग जरूर आते है।
मक्का
से 25 कि0मी0 की दूरी पर "अराफात" स्थित है, जहाँ पर हज यात्री 9वें दिन
जाते है। अराफात पूरब, उत्तर तथा दक्षिण की तरफ से खूबसूरत पहाड़ों से
घिरा है, इनमें "अल रहमत" पहाड़ सबसे खूबसूरत और प्रमुख माना जाता है।
कहते हैं इस पहाड़ से अल्लाह अपने बन्दों पर रहमतों को निछावर करता है
तथा हर हज यात्री का अराफात जाना बहुत ही जरूरी माना जाता है तभी उसकी हज
यात्रा पूरी होती है।
मक्का से पूर्व में अल-हरम-मस्जिद से 5
कि0मी0 की दूरी पर 2 पहाड़ों के बीच घाटी में "मीना" स्थित है कहते है
यहाँ पर शैतान कैद है तथा सभी हज यात्री शैतान को पत्थर मारने की रस्म
निभाने अनिवार्य रूप से यहाँ पर आते है तथा यहाँ पर रूककर जानवरों की बलि
भी जरूर चड़ाते है।
मक्का के पास में ही "जन्नत-उल-मौला" भी अति पाक एवं दर्शनीय स्थल है जहाँ पर पैगम्बर मोहम्मद साहब के सभी कब्रिस्तान में दफन है।
यहाँ
पर "जबल-अल-गुरू" एक प्रसिद्ध गुफा है। कहते है जब मक्का के तत्कालीन
शासकों ने मोहम्मद साहब और उनके परिजनों को मारने के लिये अपने सैनिक
भेजे थे तो मोहम्मद साहब ने इसी गुफा में शरण ली थी, माना जाता है इस
गुफा के मुहाने पर मकड़ियों ने अपना जाला बना दिया था जिससे सैनिक वहीं से
वापस लौट गये थें और सबके प्राण बच गये थे।
इन्ही सब कारणों से बहुत ही खुशनसीब है वह लोग जो अल्लाह की मेहरबानी से मक्का में हज करके अपना जीवन सफल कर पाते है।
मदीना
इस्लाम धर्म के मक्का के बाद मदीना दूसरा प्रमुख धार्मिक स्थल है। मदीना का
पूरा नाम "मदीना-रसूल-अल्लाह" है जिसका मतलब अल्लाह के पैगम्बरों की
धरती है। इस्लाम धर्म के अनुसार यह पूरी दुनिया के मुसलमानों की प्रथम
राजधानी है।

यह पैगम्बर के नगर के रूप में पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है,
मदीना में ही पैगम्बर जिब्राइल साहब आये थे। कहते है जब पैगम्बर मोहम्मद
साहब का विरोध करने पर उस समय के शासकों ने उन्हें मक्का छोड़ने पर मजबूर
किया था तो उन्होंने इसी पवित्र शहर को अपना ठिकाना बनाया था, यहीं से
इन्होंने अल्लाह के पवित्र संदेशों को दुनिया के सामने प्रथम बार पहुँचाया
था। यहीं से मोहम्मद साहब के धर्म और समाज में व्याप्त बुराइयों और
अन्याय का विरोध किया था, कहते है यहीं से जिहाद की शुरूआत हुयी थी। जिस
समय मोहम्मद साहब मदीना पहुँचे उस समय मदीना अलग-अलग गुटों और धर्माें
में बँटा था उनके बीच आये दिन झगड़े होते थे मोहम्मद साहब ने सबको एक
सूत्र में बाँधकर इस्लाम धर्म को स्वीकार करवाया फिर सभी गुटों पूरी आवाम
का समर्थन लेकर मक्का पर चढ़ाई की जिससे अन्ततः इस्लाम धर्म की जीत
हुयी, इसके बाद इस्लाम धर्म सर्वमान्य रूप से स्थापित हुआ।
दुनिया
भर के मुसलमानों के लिये यह जगह इसलिये भी परम श्रद्धा का केन्द्र है
क्योंकि इसी जगह पैगम्बर साहब ने अपने जीवन का बहुत समय बिताया था तथा
यहीं पर 632 ई0 में उनका निधन भी हुआ था। मोहम्मद साहब ने यह सन्देश दिया
था कि हर शख्स को अल्लाह में विश्वास रखते हुये हर तरह की बुराई से बचना
चाहिये और अच्छाइयों को अपनाना चाहिये, उनके अनुसार सभी लोगों को अपने
धर्म का पालन करते हुये एक होकर रहना चाहिये।
माना जाता है कि
पैगम्बर मोहम्मद साहब इस्लाम के आखरी नबी है तथा अब कयामत तक कोई भी नबी
नही आयेगा तथा इन्होंने अल्लाह के हुक्म से ही लोगों तक इस्लाम धर्म को
पहुँचाया था। इस्लाम से पहले अरब में कोई एक धर्म नही था लोग अलग अलग
धर्माें से जुड़े थे उनकी मान्यतायें, रीति रिवाज़ अलग अलग थे हर जगह
हिंसा, अराजकता थी, औरतो, बच्चों, कमजोरों की जानमाल की कोई भी सुरक्षा
नही थी उसी समय हज़रत मोहम्मद साहब ने इस्लाम धर्म के रूप में लोगों को
एक नई चेतना, नई रोशनी प्रदान की।
यहाँ पर "अल नबवी" के नाम से एक
बहुत ही प्रसिद्ध मस्जिद है इसका निर्माण पैगम्बर साहब के घर के निकट ही
किया गया है, यहीं पर उनकों दफनाया गया है। इस्लाम धर्म की अति पवित्र
प्रथम मस्जिद "मस्जिद-अल-कूबा" जो पूरे विश्व में प्रसिद्ध है इसी शहर
में है।
हर साल लाखों हज यात्री मक्का के बाद इस पवित्र इस्लाम शहर में जरूर आते है और इस पाक जमीं पर सज़दा करके अपना जीवन सफल बनाते है।
कर्बला

कर्बला (अरबी: كربلاء; BGN: अल - कर्बला, अल मुक्ददस के रूप में सम्बोधित)
इराक में एक शहर है, जो कि बगदाद से 100कि.मि. (62 मील) दक्षिण पश्चिम में
स्थित है। कर्बला कर्बला प्रशासनिक राजधानी है और इसकी आबादी 572,300
लोगों (2003) की है।
यह शहर, सबसे ज्यादा कर्बला की लड़ाई के स्थान
के रूप में जाना जाता है। यह शिया मुसलमानों के लिए मक्का, मदीना, और नजफ
के बाद पवित्रतम शहर है। इस शहर में इमाम हुसेन की दरगाह है, जो शिया
द्वारा पवित्र माना जाता है, इसमें उनके आधे भाई अल अब्बास इब्न अली की
मजार भी हैं।
केवल शिया विश्वास है, कि कर्बला परम्परओं (दूसरों के बीच) के अनुसार पवित्र धरती पर स्थानों में से एक है।

कर्बला
की लड़ाई में 10 मुहर्रम पर, कर्बला में इस्लामी कैलेंडर (अक्टूबर 10,
680) के वर्ष 61 में हुई थी, जो वर्तमान इराक में है। इस असमान लड़ाई में
एक तरफ मुहम्मद के पोते हुसैन इब्न अली के समर्थकों और रिश्तेदारों के एक
छोटे समूह था, और दूसरे तरफ याजिद, उमय्यद खलीफा, जिसे हुसैन ने खलीफा के
रूप में पहचानने से इनकार कर दिया था,की एक बड़े सैन्य टुकड़ी थी। हुसैन
और उनके सभी समर्थक, हुसैन के बेटे सहित मारे गए थे, और महिलाओं और बच्चों
के कैद कर लिया गया था। शिया मुसलमानों द्वारा इन मृत लोगों को शहीदों का
दरजा दिया जाता है। और, इस लड़ाई का शिया इतिहास और परंपरा में एक केंद्रीय
स्थान है, और इसे अक्सर शिया इस्लामी साहित्य में वर्णित किया जाता है।
कर्बला की लड़ाई, हर साल 10वें दिन जिसे मुहर्रम कहते हैं, शिया व सुन्नियों द्वारा मनाया जाता है।
इतिहास
कई निर्दोष लोगों के नरसंहार को देखा है, लेकिन कर्बला की त्रासदी कुछ ऐसी
है, जहां पुरुष, महिलायों और बच्चे स्वेच्छा से खुद को भूख, प्यास, अपमान
और कर्बला की जलती रेत पर मौत हो अधीन करने की अनुमति दे देते हैं।
क्योंकि, वे मानते हैं कि इमामहुसैन धर्म के लिए खड़े थे। थोड़ा आश्चर्य है
कि 1200 से अधिक वर्षों के सभी मुसलमानों के दिल में कर्बला की कहानी एक
खुला घाव की तरह बसी है। जिससे, ऐसा न हो कि वे इमाम हुसैन और उनके
अनुयायियों के सर्वोच्च बलिदान को भूल जायें।
ग्रेट आध्यात्मिक नेताओं
के महान बलिदान करने के लिए जाना जाता है। लेकिन कर्बला में, आम आदमी और
महिलायें जिनकी छाती पर शिशु हों, उनके दिल और आत्मा को जलाकर धर्म के लिये
मौत को चुनते हैं न कि बुराई और अधर्म को। ऐसी है इमाम हुसैन की महानता और
उनकी आध्यात्मिक शक्ति, जो आम मनुष्यों सर्वोच्च साहस और बलिदान की
ऊंचाइयों तक पहुँचा सकती है।
ख्वाजा मोईनुद्दीन चिस्ती
हज़रत ख्वाज़ा मोइनुद्दीन चिश्ती रहमतुल्ला अलैह एक अति प्रसिद्ध सूफी सन्त
थे। इन्होंने 12वीं शताब्दी में अजमेर में चिश्ती पंथ की शुरूआत की थी।
ख्वाज़ा मोइनुद्दीन चिश्ती का जन्म ईरान में सन् 1141 ई0 में हुआ था।
बचपन से ही उनका मन सांसारिक चीजों में नही लगता था उनका जुड़ाव रूहानी
दुनिया से हो गया था। वे मानव जगत की सेवा को ही अपने जीवन का एकमात्र
उद्देश्य मानते थे। 50 वर्ष की आयु में ही ख्वाज़ा जी भारत आ गये यहाँ
उनका मन अजमेर में ऐसा रमा कि वे फिर यहीं के होकर रह गये। वे हमेशा खुदा
से अपने भक्तों को दुःख दर्द दूर करके उनके जीवन को खुशियों से भरने की
दुआ मांगते थे। ख्वाज़ा साहब ने अपना पूरा जीवन लोगों की भलाई और खुदा की
इबादत में गुजार दिया। हर छोटे-बड़े, अमीर-गरीब, सभी लोग अपनी
परेशानियाँ और दुःख लेकर उनके पास आते और अपनी झोलियों में खुशियों और
सुकून भर ले जाते थे। ख्वाज़ा साहब ने दुनिया के लोगों का भला करते हुए
सन् 1230 ई0 में इस जहान से रूख़्सत ले ली थी।

तारागंढ़ पहाड़ी
की तलहटी में स्थित ख्वाज़ा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह शरीफ वास्तुकला
का अद्भुत नमूना है। यहाँ ईरानी और हिन्दुस्तानी वास्तुकला का सुन्दर
संगम दिखायी देता है। दरगाह का निर्माण हुमायूँ के शासनकाल में हुआ था।
दरगाह का प्रवेशद्वार और गुम्बद दर्शनीय है। प्रवेशद्वार के निकट मस्ज़िद
का निर्माण अकबर के समय में तथा मज़ार के ऊपर का आकर्षक गुम्बद शाहजहाँ
के शासन में बनवाया गया था। दरगाह के अन्दर बेहतरीन नक्काशी किया हुआ एक
चांदी का कटघरा है इस कटघरे के अन्दर ही ख्वाज़ा जी की मज़ार है। यह
कटघरा जयपुर के महाराजा जयसिंह ने बनवाया था। दरगाह में एक सुन्दर
महफिलखाना भी है, जहाँ तमाम कव्वाल ख्वाज़ा जी की शान में कव्वाली गाते है।
इस दरगाह के आँगन में दो विशालकाय देग रखी हुयी है जो अकबर और जहागीर ने
भेंट की थी। आज भी इसमें कई मन चावल पकाया जाता है जो गरीबों में बाँटा
जाता है। हर वर्ष सभी धर्माें के लाखों लोग इस दरगाह में मन्नत माँगने
आते है और मुराद पूरी होने पर अपनी हैसियत के अनुसार चादर चढ़ाते है।
यहाँ प्रतिवर्ष ख्वाज़ा जी के उर्स का आयोजन किया जाता है। यह उर्स
इस्लामी कैलेन्डर के अनुसार रजब माह में पहली से छठी तारीख तक मनाया जाता
है। छठी तारीख को ख्वाज़ा साहब की पुण्यतिथि मनायी जाती है। उर्स के
दिनों में यहाँ के महफिलखाने में देश-विदेश से आए मशहूर कव्वाल अपनी
कव्वालियाँ पेश करते है। कहते है कि यदि ज़ायरीन यहाँ आने से पहले हज़रत
निज़ामुद्दीन औलिया दिल्ली के दरबार में हाज़िरी लगाते है तो उसकी मुराद
ज़रूर से ज़रूर पूरी होती है। उर्स के मौके पर लाखों की संख्या में लोग
चादर चढ़ाने अज़मेर आते है। इस दौरान अज़मेर शरीफ़ की रौनक देखते ही बनती
है। दरगाह और उसके आस-पास का पूरा इलाका सुगन्ध से महक उठता है। यह
दरगाह शरीफ़ वास्तव में एक ऐसी जगह है जहाँ हर आम और खास मनुष्य अपने
सारे दुःखों को भूल जाता है और जाते समय अपनी झोलियाँ खुशियों से भरकर ले
जाता है।
जामा मस्जिद
जामा मस्जिद जिसे जुम्मा मस्जिद या शुक्रवार की मस्जिद भी कहा जाता है भारत
की राजधानी दिल्ली में स्थित है। जामा मस्जिद का शुमार दुनिया की सबसे
बड़ी मस्जिदों में होता है। इसका निर्माण सन् 1656 ई0 में मुगल बादशाह
शाहजहाँ ने करवाया था। यह मस्जिद लाल तथा संगमरमर के पत्थरो से बनी है इसकी
दिवारों में कुरान की आयतें उकेरी गयी है।

जामा मस्जिद पुरानी दिल्ली में लाल किले से मात्र 500 मीटर की दूरी पर
है। यह मस्जिद बहुत ही भव्य है इसे 5000 शिल्पकारों द्वारा बनाया गया था
तथा उस समय इसके निर्माण में लगभग 10 लाख का खर्च आया था। इस मस्जिद में
चार भव्य प्रवेश द्वार चार स्तम्भ और दो मिनारें है। इसका निर्माण लाल
पत्थर एवं सफेद संगमरमर से किया गया है। इस मस्जिद में उत्तर तथा दक्षिण
द्वार से प्रवेश किया जा सकता है मुख्य पूर्वी प्रवेश द्वार केवल शुक्रवार
को ही खुलता है कहते है इसका उपयोग मुगल बादशाहों द्वारा किया जाता था।
यह विशाल मस्जिद एक ऊँचे स्थान पर बनायी गयी है मस्जिद का प्रार्थना ग्रह
बहुत ही सुन्दर एवं विशाल है इसमें ग्यारह मेहराब बनाये गये है। इसके
उपर बने विशाल गुम्बद को सफेद एवं लाल संगमरमर से बहुत खूब सूरती से
सजाया गया है जो हजरत निजामुदीन औलिया की दरगाह की याद दिलाता है। वास्तव
में यह विशाल एवं भव्य मस्जिद मुगल बादशाह शाहजहाँ के वास्तुकला ज्ञान
एवं प्रेम को दर्शाते हैं। यह मस्जिद इतनी विशाल है कि इसमें समान्यतः
25000 आदमी एक साथ बैठकर नमाज पढ़ सकते हैं लेकिन शुक्रवार तथा अन्य पाक
दिनों में यह संख्या बहुत ज्यादा बड़ जाती है। इस मस्जिद को आगरा में
स्थित माती मस्जिद की अनुकृति भी कहते है तथा इस मस्जिद में हिन्दु तथा
मुस्लिम दोनो हीे धर्मो के कारीगरों वास्तुशास्त्रों ने योगदान दिया है
इसीलिये इसकी वस्तुकला में दोनो ही धर्मो को छाप स्पष्ट दिखायी देती है।
इस पाक मस्जिद में सजदा करने केवल भारत ही नही वरन् पूरी दुनिया से लाखों
लोग प्रतिवर्ष उमड़ते है तथा अपनी हर मुरादों को यहाँ की रहमतों से पूरा
होता हुआ पाते है।
हाज़ी अली दरगाह
हाजी अली की दरगाह मुम्बई के दक्षिण में वरली के किनारे एक छोटे से टापू पर
बनी है जो मुख्य सड़क से लगभग 400 मी0 की दूरी पर है। यह मुम्बई का एक
अत्यन्त प्रसिद्ध स्थान है, जो शहर के बीचो बीच स्थित है। यह इस्लामिक
वास्तुकला का एक अत्यन्त सुन्दर नमूना है जिसमें सैयद पीर हाजी अली शाह
बुखारी की कब्र स्थापित है।

हाजी अली दरगाह एक धनवान मुस्लिम व्यापारी सैयद पीर हाजी अली शाह बुखारी
की याद में सन् 1431 में बनायी गयी थी जिन्होने मक्का के तीर्थयात्रा के
पहले सारे सांसारिक सुखों का त्याग कर दिया था। वैसे तो यहाँ पर रोजाना
हजारो श्रद्धालु आते है परन्तु हर वृहस्पतिवार व शुक्रवार को इस दरगाह में
दर्शन करनें के लिए लगभग 40000 से ज्यादा लोग जमा होते है। शुक्रवार को
अकसर यहाँ कव्वाली का भी आयोजन किया जाता है।
इस दरगाह तक पहुँचने का रास्ता बहुत कुछ ज्वार भाटाओं पर निर्भर करता है।
चूंँकि यहाँ तक आने वाली पक्की सड़क की ऊँचाई बहुत कम है और दोनो तरफ
समुन्दर है, अतः जब भी ऊँचा ज्वार आता है तो यह सड़क लुप्त हो जाती है, अतः
यहाँ तक जाने का रास्ता हल्के ज्वार के समय में ही सम्भव है।
यह सफेद रंग की दरगाह 4500 वर्गमीटर के क्षेत्र में फैली हुई है और दरगाह
के निकट 85 फुट ऊँची मिनार है इसके अन्दर मजार को लाल व हरे रंग की चादर
से ढका गया है। इस मजार के चारों ओर चांदी के डंडों से बना एक दायरा है,
दरगाह मे संगमरमर के बने कई खम्बे हैं जिन पर रंगीन कांच से कलाकारी की
गयी है तथा इसके उपर अल्लाह के 99 नाम लिखे गये हैं। यहाँ पर महिलाओं व
पुरुषों के प्रार्थना के लिए अलग-अलग कमरे है।
हाजी अली साहब के मुरीद केवल मुम्बई में ही नही वरन् पूरी दुनिया में
फैले हैं और हर साल उनके लाखों मुरीद उनके दर्शन के लिये यहाँ पर आते है
तथा अपनी झोलियाँ खुशियों से भर ले जाते है।
शेख जायद ग्रांड मस्जिद
राजसी “शेख जायद ग्रांड मस्जिद” अबू धाबी, संयुक्त अरब अमीरात की राजधानी
में स्थित है। यह कृति यकीनन समकालीन संयुक्त अरब अमीरात समाज के सबसे
महत्वपूर्ण वास्तुशिल्प खजाने की एक और दुनिया में सबसे सुंदर है। यह
संयुक्त अरब अमीरात में सबसे बड़ी मस्जिद है, और दुनिया में शीर्ष 10 सबसे
बड़ी मस्जिदों के भीतर माना जाता है।

शेख जायद ग्रांड मस्जिद का डिजाइन और निर्माण “दुनिया को एकजुट” करता है।
उपयोग सामग्री और कारीगरों कई देशों से:- इटली, जर्मनी, मोरक्को, भारत,
तुर्की, मलेशिया,ईरान, चीन, यूनाइटेड किंगडम, न्यूजीलैंड, ग्रीस और संयुक्त
अरब अमीरात को बुलवाया गया था। 3,000 से अधिक कर्मचारियों और 38 प्रसिद्ध
करार कंपनियों ने मस्जिद के निर्माण में भाग लिया था। इसकी डिजाइन और
निर्माण के लिये संगमरमर पत्थर, सोना, अर्द्ध कीमती पत्थरों, क्रिस्टल और
चीनी मिट्टी की चीज़ों सहित लंबे समय से स्थायी गुणों वाली प्राकृतिक
सामग्री का प्रयोग हुआ है।
सबसे बड़ा कालीन:- दुनिया में सबसे बड़ा होने के लिए
कहा जाने वाला और अत्याधिक महत्वपूर्ण केंद्र,
एक 6000 वर्ग मीटर (64,583 वर्ग फुट) हाथ से बनाया फ़ारसी कालीन है।1200
ईरानी महिलाओं के द्वारा 2 साल में इस कालीन का निर्माण हुआ है, जिसका वजन
45 टन है। शेख जायद मस्जिद के मुख्य प्रार्थना हॉल के फर्श को कवर करने
वाला यह विशाल कालीन एक बार में ९००० से ज्यादा श्रद्धालुऔं को समायोजित कर
सकता है।
सबसे बड़ा:- गुंबदमुख्य गुंबद भी दुनिया में
"सबसे बड़ी" मस्जिद गुंबदों में से एक है, जिसका ऊँचाई 75 मीटर (246 फीट)
और लम्बाई 32.2 मीटर (105.6 फीट) है।
सबसे बड़ा झूमर:- यह सात जर्मनी झूमरों में से एक है। यह 10 मीटर (32.8 फुट) लंबा, चौड़ा 10 मीटर और नौ टन वजन का है।
मस्जिद
सभी जाति, धर्म और राष्ट्रीयता के आगंतुकों के लिए खुला है। आगंतुकों को
आगमन पर ठीक से तैयार होना चाहिए, नहीं तो प्रवेश से वंचित हो सकते हैं।
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